कोऊ गोबर पाथनी, कोऊ ढोवै पाई ।
कोऊ सुहागिल लाड़िली, बोलत हूँ अलसाई ।।
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (145)
श्री स्वामिनी जू के विविध स्वरूपों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि किसी ने उन्हें साधारण गोबर थापने वाली गोपी के रूप में देखा, किसी ने जल-ढोने वाली के रूप में समझा; किंतु वास्तव में वे नित्य निकुंजेश्वरी, परम सुकुमार और शिरोमणि लाड़िली श्री राधा हैं, जो नित्य विहार में ऐसे उन्मत्त हैं कि वे बोलने में भी अलसाती हैं।
कोऊ सुहागिल लाड़िली, बोलत हूँ अलसाई ।।
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (145)
श्री स्वामिनी जू के विविध स्वरूपों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि किसी ने उन्हें साधारण गोबर थापने वाली गोपी के रूप में देखा, किसी ने जल-ढोने वाली के रूप में समझा; किंतु वास्तव में वे नित्य निकुंजेश्वरी, परम सुकुमार और शिरोमणि लाड़िली श्री राधा हैं, जो नित्य विहार में ऐसे उन्मत्त हैं कि वे बोलने में भी अलसाती हैं।

