नीके बिहारी- बिहारिनि प्यारे - श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (106)

नीके बिहारी- बिहारिनि प्यारे - श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (106)

नीके बिहारी- बिहारिनि प्यारे ।
कुंजमहल राजत रँगभीनै सखि नैंननि के तारे ॥ [1]
अद्भुत गौर-साँवरे दम्पति पलहू होत न न्यारे ।
मन बसी रसी सोहनी मूरति बिसरत क्यौंब बिसारे ॥ [2]
रूपसुधा रस पियै परसपर रहत प्रेम मतवारे ।
गोबिंदसरन जिय कल न परत है जब ते नैन निहारे ॥ [3]

- श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (106)

कुंजमहल में विराजमान प्रेम रंग में भींजे श्री श्यामाश्याम बड़े प्यारे लग रहे हैं, जो सखियों के आँखों के तारे हैं । [1]

नित्य दम्पति साँवरे श्री कृष्ण एवं गौरांगी श्री राधा एक क्षण के लिए भी एक-दूसरे से पृथक नहीं हो रहे हैं । यह अद्भुत छवि मेरे मन में बस गयी है जिसे प्रयत्न करने पर भी मैं भूल नहीं सकता । [2]

श्री गोविन्दशरण देवाचार्य कह रहे हैं "श्री श्यामाश्याम एक दूसरे को निहार रहे हैं, अद्भुत रूपसुधा का पान कर प्रेम में मतवारे हो रहे हैं, एवं इस छबि को अपनी आँखों से देखने के बाद मेरा ह्रदय धैर्य धारण करने में असमर्थ हो रहा है ।" [3]