जह नग खग मृग लता कुंज - नंद दास ग्रंथावली, रास पंचाध्यायी, श्री वृंदावन वर्णन (18)

जह नग खग मृग लता कुंज - नंद दास ग्रंथावली, रास पंचाध्यायी, श्री वृंदावन वर्णन (18)

जह नग खग मृग लता कुंज वीरुध तृन जेते ।
नहिं न काल गुन प्रभा सदा सोभित रहै तेते ।।

- श्री नंद दास, नंद दास ग्रंथावली, रास पंचाध्यायी, श्री वृंदावन वर्णन (18)

वृन्दावन के वृक्ष, गिरि, पक्षी, मृग, लताएँ और समस्त कुंज सदा दिव्य शोभा से युक्त रहते हैं। वे काल के प्रवाह और प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव से अछूते हैं; इसलिए उनकी छटा नित्य नवीन और अविनाशी प्रतीत होती है।