आजु कछु कुंजनिमें वरषासी - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (292)

आजु कछु कुंजनिमें वरषासी - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (292)

(राग मल्हार)
आजु कछु कुंजनिमें वरषासी ।
बादल दल में देखि सखीरी, चमकति है चपलासी ॥ [1]
नाँन्हीं नाँन्हीं बूँदनि कछू धुरवा से, पवन बहै सुखरासी ।
मंद मंद गरजनि सी सुनियतु, नाँचति मोर सभासी ॥ [2]
इन्द्रधनुषमें बग पंकति डोलति, बोलत है कोकिलासी ।
चंद्रवधू छबि छाइ रही मानौं गिरि पर अरुनघटासी ॥ [3]
रटत व्यास चातृक ज्यौं रसना, रसपीवत हूँ प्यासी ॥ [4]

- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (292)

सखी भावयुक्त श्री हरिराम व्यास अन्य सखी से कहते हैं "हे सखी, आज कुञ्ज में हल्की वर्षा हो रही है । उन बादलों के भीतर बिजली की चपल तरंगों को तो देख ।" [1]

वर्षा की छोटी-छोटी बूँदें कैसा अंधेरा कर रहे हैं, एवं प्रवाहमान शीतल पवन बहुत ही सुखदायी है । आकाश में मंद-मंद बिजली की गड़गड़ाहट को सुन, जिसे सुनकर मोर के समूह नृत्य कर रहे हैं । [2]

आकाश में इंद्रधनुष के मध्य कलहंस पंक्ति में उड़ रहे हैं, कोकिला मधुर स्वर में गान कर रही है । पर्वत के ऊपर चन्द्र भी अरुण वर्ण के दिख रहे हैं, मानों वधु हैं । [3]

श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि कुञ्ज के इस दृश्य का वर्णन कर मेरी जीभ चातक पक्षी की भांति हो गयी है, जो रसपान तो कर रही है परंतु फिर भी प्यासी है । [4]