मैं भोरी मेरी भोरी किशोरी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (411)

मैं भोरी मेरी भोरी किशोरी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (411)

मैं भोरी मेरी भोरी किशोरी ।
मैं भोरी सी विनती लाई, तुम रीझन में भोरी । [1]
छोटे मुख बड़ विनय लाड़िली, विहँसि वेगि पुजवौ री ॥
भोरी स्वामिनि भोरी चेरी, नातौ नेह भलौ री । [2]
'भोरी हित' हरिवंश कृपा बल, सत सम्बन्ध जुरौ री ॥ [3]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (411)

हे किशोरी जू! जिस प्रकार में भोली हूँ, उसी प्रकार आप भी अत्यन्त भोली हैं, अतः जब मैंने अपने भोले-भाले ढंग से आपके सामने एक विनम्र प्रार्थना की है, तो आप भी अपने सहज स्वभाव के वशीभूत होकर मुझ पर यथाशीघ्र रीझकर अपने भोले-भाले होने का परिचय प्रदान करें । [1]

हे लाड़िली जू! यद्यपि मैं इस योग्य नहीं हूँ, फिर भी मैंने आपसे विनम्र प्रार्थना करने का साहस दिखाया है, अब आप मेरी विनती को स्वीकार कर शीघ्र ही प्रसन्नता के साथ मुझे अपने दर्शन देने की कृपा करें । आप मेरी भोली स्वामिनी हैं और मैं आपकी भोली दासी हूँ, यह भोलेपन का नाता बहुत सुन्दर है । [2]

श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि "श्रीहित हरिवशचन्द्र जू की कृपा के बल पर मेरा और आपका सच्चा सम्बन्ध स्थापित हो गया है । [3]