यमुना वृन्दाविपिन की, बरनी केलि अनूप ।
करे भावना नित्य जो, होईं भावना रूप ॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, बिहार चंद्रिका (85)
श्री यमुना के तट पर स्थित श्री वृन्दावन की केलि अनूप और अवर्णनीय है। जो साधक निरंतर इस लीला की भावना करता है, वह अंततः उसी भावना में तन्मय होकर लीला-रस का साक्षात् अनुभव करने लगता है।
करे भावना नित्य जो, होईं भावना रूप ॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, बिहार चंद्रिका (85)
श्री यमुना के तट पर स्थित श्री वृन्दावन की केलि अनूप और अवर्णनीय है। जो साधक निरंतर इस लीला की भावना करता है, वह अंततः उसी भावना में तन्मय होकर लीला-रस का साक्षात् अनुभव करने लगता है।

