बाँके मते मन, बाँकी ये बात - ब्रज के सेवैया

बाँके मते मन, बाँकी ये बात - ब्रज के सेवैया

बाँके मते मन, बाँकी ये बात, सु बाँकी ये घात लहै को तिहारी। [1]
बाँकौ निकुंज-गली वन बाँकी, सु बाँकी बसीठि बिलोकनि हारी॥ [2]
बाँकी भजन्न अनन्यनि कौ धन, बाँकी ये मौज लहै को तिहारी। [3]
बाँके विहार करैं मिलि मानिनि, बाँकी बिहारिनि बाँके बिहारी॥ [4]

- ब्रज के सेवैया

वृन्दावन-बिहारिणी श्रीश्यामा महारानी जितनी विलक्षण हैं, उतने ही विलक्षण हैं उनके प्राणाराध्य, जीवन-सर्वस्व श्रीबिहारीजी। दोनों के मन की चाह बड़ी ही विलक्षण हैं और उनसे भी विलक्षण हैं इनके प्रेम की राहें, प्रेम की बातें, और वह गहरी घातें, जिन्हें कोई और समझ ही नहीं सकता। [1]

निकुंज की गलियाँ जितनी बाँकी-तिरछी हैं, उतना ही बाँका है उनका यह रसमय वृन्दावन। नित्यविहार का आनंद लेती हुई और इन्हें सदा नव-नव रस-विलास के लिए प्रेरित करती सखियाँ भी कम विलक्षण नहीं हैं। [2]

रसिक अनन्यों की यह रसोपासना अत्यंत अनूठी है — उनकी रस-रीति भी निराली है। मनोज-मौज से भरी इस निराली, बाँकी रस-रीति को भला और कोई कैसे समझ सकता है? [3]

श्रीप्रियाजी की सहज मान से ओतप्रोत लाड़-प्यार की झलक और उनके साथ सदा क्रीड़ाशील श्रीबिहारीजी की बाँकी झाँकी मेरे नयनों में सदा बसी रहे। [4]