श्यामा श्याम बिसारी के, करि न और की आस।
दीजो मोहि वृज लाड़िली, चातक जैसी प्यास॥
- ब्रज के दोहे
दिव्य दम्पति श्री श्यामा-श्याम को बिसारकर मैं अन्य किसी की भी आस स्वप्न में भी न करूँ। हे ब्रज की लाड़िली श्री श्यामा जू! मुझे चातक जैसी अनन्य प्यास दीजिए।
दीजो मोहि वृज लाड़िली, चातक जैसी प्यास॥
- ब्रज के दोहे
दिव्य दम्पति श्री श्यामा-श्याम को बिसारकर मैं अन्य किसी की भी आस स्वप्न में भी न करूँ। हे ब्रज की लाड़िली श्री श्यामा जू! मुझे चातक जैसी अनन्य प्यास दीजिए।

