हीन भएँ जल मीन अधीन - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (100)

हीन भएँ जल मीन अधीन - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (100)

(सवैया)
हीन भएँ जल मीन अधीन, कहा कछु मो अकुलानि समानै। [1]
नीर सनेही कों लाय कलंक, निरास ह्वै कायर त्यागत प्रानै॥ [2]
प्रीति की रीति सु क्यौं समझै जड़, मीत के पानि परे कों प्रमानै। [3]
वा मन की जु दसा घनआनँद, जीव की जीवनि जान ही जानै॥ [4]

- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (100)

जल से अलग होकर मछली बहुत पीड़ित होती है, पर क्या उसका यह कष्ट मेरे कष्ट की बराबरी कर सकता है? [1]

अपने प्रिय जल का संग छोड़कर, और उसे कलंकित कर, वह कायर मछली प्राण त्याग देती है। [2]

मछली प्रेम का सत्य क्या जाने? वह तो जड़-प्रिय (जल) के अधीन रहना ही प्रेम मानती है और उसी को भक्ति समझकर संतोष करती है। [3]

श्री घनानंद कहते हैं—प्रिय वियोग में मेरे मन की जो अद्भुत दशा है, उसे तो केवल घनानंद प्रदाता, प्राणों के प्राण श्रीकृष्ण ही जान सकते हैं। [4]