(राग यमन एवं जिला)
सुन्दर अनूप जोरी, अति मन को भावती ।
देखी मैं आज मग में, कुंजन सों आवती ॥ [1]
अँग अँग देत शोभा, भूषण जड़ाऊ आली ।
नयनन में सोहै काजर, अधरन पै पान लाली ॥ [2]
प्रीतम के कांधे कर धर, प्यारी अनन्द सों ।
हँसि हँसि के करत बातैं, मुख ललित चन्दसों ॥ [3]
पग धरत हौंलें हौंलें, गति देख हंस लाजैं ।
नूपुर परम मनोहर, अति मधुर मधुर बाजैं ॥ [4]
या भाँति सों मगन ह्वै क्रीड़ा करत हैं दोऊ ।
नारायण रसिकजन बिन, ये रस न जाने कोऊ ॥ [5]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (29)
आज मार्ग में मैंने देखा की श्री राधा कृष्ण कुञ्ज से आ रहे हैं, जिनकी छबि अति सुन्दर एवं अनुपम है, जो मेरे ह्रदय को बहुत भाति है । [1]
श्री श्यामाश्याम के अंगों में विराजमान आभूषण उनकी शोभा में वृद्धि कर रहे हैं । उनके नेत्रों में काजल शोभायमान है और अधर पान की पीक से अरुण हैं । [2]
श्री राधा प्रियतम श्री कृष्ण के कंधे पर हाथ धरकर बड़े आनंद से हंस-हंस कर उनसे बातें कर रही हैं, उनके मुख की उज्ज्वलता चंद्र के समान है । [3]
श्री श्यामाश्याम बड़े धीरे-धीरे पग आगे बढ़ा रहे हैं, जिनकी गति देखकर हन्स भी लज्जित हो रहा है । चरणों में विराजमान सुन्दर नूपुर अति मधुर ध्वनि प्रकट कर रहा है । [4]
इस प्रकार श्री श्यामाश्याम प्रसन्न कर क्रीड़ा कर रहे हैं । श्री नारायण स्वामी कहते हैं "रसिकों के संग के बिना यह दुर्लभ दिव्य रस कोई नहीं जान सकता ।" [5]
सुन्दर अनूप जोरी, अति मन को भावती ।
देखी मैं आज मग में, कुंजन सों आवती ॥ [1]
अँग अँग देत शोभा, भूषण जड़ाऊ आली ।
नयनन में सोहै काजर, अधरन पै पान लाली ॥ [2]
प्रीतम के कांधे कर धर, प्यारी अनन्द सों ।
हँसि हँसि के करत बातैं, मुख ललित चन्दसों ॥ [3]
पग धरत हौंलें हौंलें, गति देख हंस लाजैं ।
नूपुर परम मनोहर, अति मधुर मधुर बाजैं ॥ [4]
या भाँति सों मगन ह्वै क्रीड़ा करत हैं दोऊ ।
नारायण रसिकजन बिन, ये रस न जाने कोऊ ॥ [5]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (29)
आज मार्ग में मैंने देखा की श्री राधा कृष्ण कुञ्ज से आ रहे हैं, जिनकी छबि अति सुन्दर एवं अनुपम है, जो मेरे ह्रदय को बहुत भाति है । [1]
श्री श्यामाश्याम के अंगों में विराजमान आभूषण उनकी शोभा में वृद्धि कर रहे हैं । उनके नेत्रों में काजल शोभायमान है और अधर पान की पीक से अरुण हैं । [2]
श्री राधा प्रियतम श्री कृष्ण के कंधे पर हाथ धरकर बड़े आनंद से हंस-हंस कर उनसे बातें कर रही हैं, उनके मुख की उज्ज्वलता चंद्र के समान है । [3]
श्री श्यामाश्याम बड़े धीरे-धीरे पग आगे बढ़ा रहे हैं, जिनकी गति देखकर हन्स भी लज्जित हो रहा है । चरणों में विराजमान सुन्दर नूपुर अति मधुर ध्वनि प्रकट कर रहा है । [4]
इस प्रकार श्री श्यामाश्याम प्रसन्न कर क्रीड़ा कर रहे हैं । श्री नारायण स्वामी कहते हैं "रसिकों के संग के बिना यह दुर्लभ दिव्य रस कोई नहीं जान सकता ।" [5]

