अब तो कृष्ण नाम मन अटक्यौ ।
अति अहलाद बढ्यौ छिन ही छिन, स्वाद अलौकिक गटक्यौ ॥ [1]
बिसरि गई सुधि देह गेह की, युगल नेह उर खटक्यौ ।
गौर स्याम अंग अंग माधुरी, निरखि तहाँ ही ठटक्यौ ॥ [2]
तिरछी चितवनि हँसनि मनोहर, पेखि अनत नहिं भटक्यौ ।
'अलि किशोरी' बस वृन्दाबन, फेरि नहिं कहूँ सटक्यौ ॥ [3]
- श्री किशोरी अलि जी
मेरा मन अब श्री कृष्ण नाम में अटक गया है, जिसके उच्चारण के स्वाद से मुझे ह्रदय में अति-आह्लाद का अनुभव हो रहा है, जो क्षण-क्षण में बढ़ रहा है । [1]
युगल किशोर श्री श्यामाश्याम का दिव्य प्रेम मेरे ह्रदय में समा गया है, अब मुझे न देह की सुधि है न घर की । गौर वर्ण की श्री राधा एवं श्याम वर्ण के श्री कृष्ण की अंग माधुरी का दर्शन कर मेरा मन उनके सुन्दर रूप-सुधा में अटक गया है । [2]
युगल किशोर की तिरछी चितवन एवं हँसी मन का हरण करने वाला है, जिसके दर्शन के पश्चात् मन कहीं और जाता ही नहीं । श्री किशोरी अलि जी कहते हैं "युगल किशोर की नित्य-क्रीड़ा स्थली श्री वृन्दावन में ही अब मुझे बसना है, इसके अतिरिक्त अब कहीं और नहीं जाना है ।" [3]
अति अहलाद बढ्यौ छिन ही छिन, स्वाद अलौकिक गटक्यौ ॥ [1]
बिसरि गई सुधि देह गेह की, युगल नेह उर खटक्यौ ।
गौर स्याम अंग अंग माधुरी, निरखि तहाँ ही ठटक्यौ ॥ [2]
तिरछी चितवनि हँसनि मनोहर, पेखि अनत नहिं भटक्यौ ।
'अलि किशोरी' बस वृन्दाबन, फेरि नहिं कहूँ सटक्यौ ॥ [3]
- श्री किशोरी अलि जी
मेरा मन अब श्री कृष्ण नाम में अटक गया है, जिसके उच्चारण के स्वाद से मुझे ह्रदय में अति-आह्लाद का अनुभव हो रहा है, जो क्षण-क्षण में बढ़ रहा है । [1]
युगल किशोर श्री श्यामाश्याम का दिव्य प्रेम मेरे ह्रदय में समा गया है, अब मुझे न देह की सुधि है न घर की । गौर वर्ण की श्री राधा एवं श्याम वर्ण के श्री कृष्ण की अंग माधुरी का दर्शन कर मेरा मन उनके सुन्दर रूप-सुधा में अटक गया है । [2]
युगल किशोर की तिरछी चितवन एवं हँसी मन का हरण करने वाला है, जिसके दर्शन के पश्चात् मन कहीं और जाता ही नहीं । श्री किशोरी अलि जी कहते हैं "युगल किशोर की नित्य-क्रीड़ा स्थली श्री वृन्दावन में ही अब मुझे बसना है, इसके अतिरिक्त अब कहीं और नहीं जाना है ।" [3]

