तन मन नवल जुगल पर वारौं - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1346)

तन मन नवल जुगल पर वारौं - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1346)

(राग धनाश्री)
तन मन नवल जुगल पर वारौं ।
कुंज रंध्र गौर स्याम छबि बारंबार निहारौं ।। [1]
अपनी टहल कृपा करि दीजे ता संग जीव उबारौं ।
'परमानंद' जु लाभ भजन बिन काज सबै लै जारों ।। [2]

- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1346)

अपने तन मन को दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण पर समर्पित करता हूँ  । मैं बार-बार गौर श्याम वर्ण की युगल जोड़ी को कुंज के भीतर किसी द्वार से निहारता रहूँ ।[1]

ऐसी कृपया कीजिए जिससे कि मुझे अपनी नित्य सेवा प्राप्त हो जाए और मेरी इस जीवात्मा का उद्धार हो जाए । श्री परमानंद दास जी कहते हैं कि यदि निष्काम भजन के अतिरिक्त मेरे हृदय में कोई भी कामना अभी शेष बची हो तो ऐसी समस्त कामनाओं को जला कर राख कर दीजिए। [2]