जिनके मुख नहीं निसरत राधे - श्री प्रेम सखी जी

जिनके मुख नहीं निसरत राधे - श्री प्रेम सखी जी

जिनके मुख नहीं निसरत राधे।
तिनके मुख कूकर सूकर सम दीखत गात मिटै नहीं बाधे॥ [1]
इत उत फिरत चहुँ चितवत, आप ते आप लगे अपराधे।
प्रेमसखी इक नाम वैद्य बिनु तड़फत है भव - सिंधु अगाधे॥ [2]

- श्री प्रेम सखी जी

श्री प्रेम सखी जी कहते हैं कि जिसके मुख से "श्री राधे" नाम नहीं निकलता, उसका मुख कुत्ते और सूअर के समान है। ऐसे व्यक्ति का दर्शन परमार्थ के मार्ग में बड़ी बाधा उत्पन्न करता है, और यह बाधा प्रयास करने पर भी दूर नहीं होती। [1]

जो श्री राधा नाम से रहित है, वह व्यक्ति इस संसार में यहाँ-वहाँ भटकता रहता है, उसका मन कहीं स्थिर नहीं हो पाता। साधुओं का निरादर करने से उसे अपने-आप ही अपराध का भागी बनना पड़ता है। श्री प्रेम सखी जी कहते हैं कि बिना "श्री राधे" नाम रूपी वैद्य के, जीव इस कठिन संसार-सागर में पीड़ा और भ्रम में भटकता रहता है। [2]