रज छाँड़ै रज पाइयै - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (331)

रज छाँड़ै रज पाइयै - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (331)

रज छाँड़ै रज पाइयै, रज राखैं रज जाइ ।
रज सौं रजहि पिछाँटि लै, रज सौं रसिक कहाइ ॥

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (331)

जो साधक रजोगुण का त्याग कर देता है, वही नित्य-विहारिणी श्री राधा की इस अद्भुत वृन्दावन-रज का अधिकारी बनता है; और जो इस वृन्दावन-रज को अपने पास रखता है, उसके प्रभाव से रजोगुण स्वतः क्षीण होने लगता है। इस रज के प्रति श्रद्धा जाग्रत होने पर रजोगुण-रूपी मल दूर हो जाता है। जो इस रज का सेवन करता है, वही प्रिया-प्रियतम के प्रेम-रस को प्राप्त कर वास्तव में “रसिक” कहलाता है।