मैं दासी अपनी राधा की - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (291)

मैं दासी अपनी राधा की - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (291)

(राग जैजैवंती)
मैं दासी अपनी राधा की
करत खवासी जो रुचि पावत । [1]
सूधे वचन न बोलत सपनेहु
हरिहू को अँगुठा दिखरावत ॥ [2]
ब्रह्मानंद मगन सुख सिधि निधि
श्रीवन गैल पांव ठुकरावत । [3]
मुसतगनी मगरूरी डोलत
ललितकिशोरी को गुन गावत ॥ [4]

- ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (291)

मैं अपनी राधा की नित्य ही दासी हूं और उनको जो जो रुचिकर होता है वही वही करके विभोर होती हूं । [1]

मैं श्री हरि की भी परवाह नहीं करती (उनको सपने में भी मृदु वचन नहीं बोलती) और श्री राधा के बल से उनको भी अंगूठा दिखला देती हूं । [2]

श्री वृंदावन की निकुंज गलियों में अपने पाँव से मैं ब्रह्मानंद के सुख, सिद्धि और निद्धि इत्यादि को ठुकरा देती हूं । [3]

मैं तो श्री ललित किशोरी अर्थात श्री राधा के प्रेम में उन्मत्त हुई डोलती फिरती हूं एवं उन्हीं का अनन्य रूप से गुणगान करती हूं । [4]