व्रज तजि अनत न जाई हों, यही हमारी टेक।
भूतल भार उतारि हों, धरि हों रूप अनेक॥
- ब्रज के दोहे
कुंज-बिहारी श्री श्यामसुंदर का यह दृढ़ और अनन्य संकल्प है कि वे ब्रज को छोड़कर एक पल के लिए भी बाहर नहीं जाते। ब्रज से बाहर जो-जो लीलाएँ प्रकट होती हैं, उन्हें वे अपने अन्य-अन्य रूप धारण करके सम्पन्न करते हैं; स्वयं ब्रज-धाम से उनका वियोग कभी नहीं होता।
भूतल भार उतारि हों, धरि हों रूप अनेक॥
- ब्रज के दोहे
कुंज-बिहारी श्री श्यामसुंदर का यह दृढ़ और अनन्य संकल्प है कि वे ब्रज को छोड़कर एक पल के लिए भी बाहर नहीं जाते। ब्रज से बाहर जो-जो लीलाएँ प्रकट होती हैं, उन्हें वे अपने अन्य-अन्य रूप धारण करके सम्पन्न करते हैं; स्वयं ब्रज-धाम से उनका वियोग कभी नहीं होता।

