ऐसैं काल बितावों निसिदिन ।
भोर साँझि लगि, साँझि भोर लौं, लाड़ लड़ाय दोऊ जन ॥ [1]
छिन बिच्छेप न होइ टहल में, कीजै यह अद्भुत पन ।
सब रस को रस-सार बिहार, सुबर्न्यो हंस रसिक गन ॥ [2]
विविध भाँति के और भजन जे, लौंन बिना ज्यों विंजन ।
श्रीराधा-पद-कमल-कृपा बिनु, को पावै रस कौ कन? [3]
श्रीवृंदावन बास रासि-रस, समय प्रबंध परमधन।
‘अलबेली' श्रीबंसीअलि बलि, यह मानों मेरे मन ॥ [4]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध
ऐसा मेरे जीवन में कब समय आएगा जब मुझे सांझ भोर लगेगी और भोर सांझ लगेगी अर्थात् मैं नित्य ही प्रिया लाल को लाड़ लड़ाऊंगा और मुझे समय का भी आभास नहीं रहेगा । [1]
ऐसी मेरी भक्ति कब जागृत होगी कि मेरी महल टहल में एक क्षण को भी विक्षेप नहीं पड़ेगा । ऐसा कब होगा कि मैं भी अनन्य रसिकों द्वारा वर्णित समस्त रसों के सार रस विहार को ही हृदय से अनन्य रूप से ग्रहण करूंगा । [2]
विविध प्रकार के अन्य भजन तो मानो बिना नमक (स्वाद) के भोजन के समान है। श्री राधा के कमल चरणों की कृपा के बिना ऐसा कौन है जो रस का एक कण भी प्राप्त कर सके? [3]
रस की राशि श्री वृंदावन धाम का अखंड वास प्राप्त कर मैं अष्टयाम सेवा रूपी परम धन प्राप्त करूँगा । श्री अलबेली अलि जी कहते हैं कि श्री वंशीअलि जी की मैं बलिहारी जाता हूँ जिनकी कृपा को मेरा हृदय स्वीकार कर रहा है । [4]
भोर साँझि लगि, साँझि भोर लौं, लाड़ लड़ाय दोऊ जन ॥ [1]
छिन बिच्छेप न होइ टहल में, कीजै यह अद्भुत पन ।
सब रस को रस-सार बिहार, सुबर्न्यो हंस रसिक गन ॥ [2]
विविध भाँति के और भजन जे, लौंन बिना ज्यों विंजन ।
श्रीराधा-पद-कमल-कृपा बिनु, को पावै रस कौ कन? [3]
श्रीवृंदावन बास रासि-रस, समय प्रबंध परमधन।
‘अलबेली' श्रीबंसीअलि बलि, यह मानों मेरे मन ॥ [4]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध
ऐसा मेरे जीवन में कब समय आएगा जब मुझे सांझ भोर लगेगी और भोर सांझ लगेगी अर्थात् मैं नित्य ही प्रिया लाल को लाड़ लड़ाऊंगा और मुझे समय का भी आभास नहीं रहेगा । [1]
ऐसी मेरी भक्ति कब जागृत होगी कि मेरी महल टहल में एक क्षण को भी विक्षेप नहीं पड़ेगा । ऐसा कब होगा कि मैं भी अनन्य रसिकों द्वारा वर्णित समस्त रसों के सार रस विहार को ही हृदय से अनन्य रूप से ग्रहण करूंगा । [2]
विविध प्रकार के अन्य भजन तो मानो बिना नमक (स्वाद) के भोजन के समान है। श्री राधा के कमल चरणों की कृपा के बिना ऐसा कौन है जो रस का एक कण भी प्राप्त कर सके? [3]
रस की राशि श्री वृंदावन धाम का अखंड वास प्राप्त कर मैं अष्टयाम सेवा रूपी परम धन प्राप्त करूँगा । श्री अलबेली अलि जी कहते हैं कि श्री वंशीअलि जी की मैं बलिहारी जाता हूँ जिनकी कृपा को मेरा हृदय स्वीकार कर रहा है । [4]

