यह रस नित्य-विहार बिनु, सुन्यौ न देख्यौ नैन ।
एक प्रीति वय रूप दोउ, बिलसत इक रस मैन ।।
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (7)
यह दिव्य प्रेम-रस “नित्य-विहार” के बिना न तो कहीं प्रत्यक्ष देखा गया है और न ही श्रवण में आया है। इस नित्य-विहार में प्रेमी और प्रेमास्पद की प्रीति, स्वरूप और आयु सदा एकरस और समान रहते हैं, तथा युगल सरकार अनवरत संयोग-वियोग से परे प्रेम-केलि में निमग्न रहते हैं।
एक प्रीति वय रूप दोउ, बिलसत इक रस मैन ।।
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (7)
यह दिव्य प्रेम-रस “नित्य-विहार” के बिना न तो कहीं प्रत्यक्ष देखा गया है और न ही श्रवण में आया है। इस नित्य-विहार में प्रेमी और प्रेमास्पद की प्रीति, स्वरूप और आयु सदा एकरस और समान रहते हैं, तथा युगल सरकार अनवरत संयोग-वियोग से परे प्रेम-केलि में निमग्न रहते हैं।

