लाय समाधि रहे ब्रह्मादिक - श्री रसखान

लाय समाधि रहे ब्रह्मादिक - श्री रसखान

(सवैया)
लाय समाधि रहे ब्रह्मादिक, योगी भये पर अंत न पावैं। [1]
साँझ ते भोरहि भोर ते साँझहि, सेस सदा नित नाम जपावैं॥ [2]
ढूँढ़ फिरे तिरलोक में साख, सुनारद लै कर बीन बजावैं। [3]
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै॥ [4]

- श्री रसखान

जिसका ध्यान ब्रह्मा आदि देवता समाधि में करते हैं और योग-सिद्धि प्राप्त करने पर भी जिनका अंत नहीं पा सकते। [1]

शेषनाग अपने सौ मुखों से दिन-रात निरंतर उनका नाम जपते रहते हैं। [2]

नारद तीनों लोकों में विचरण कर वीणा बजाते और उनकी कीर्ति का गान करते रहते हैं। [3]

वही भगवान श्रीकृष्ण अहीरिनों की छोहरियों (गोपियों) के हाथों छाछ की छोटी कटोरी पर नाचते हैं। [4]