रोम रोम जो अघ भर्यो पतितन में सिरनाम - श्री रसनिधि जी

रोम रोम जो अघ भर्यो पतितन में सिरनाम - श्री रसनिधि जी

रोम रोम जो अघ भर्यो, पतितन में सिरनाम।
रसनिधि वाहि निबाहियौ, प्रभु तेरोई काम॥

- श्री रसनिधि जी

हे प्रभु! मेरे रोम-रोम में पाप भरे हुए हैं; मैं पापियों में शिरोमणि हूँ। रसनिधि कहते हैं, हे प्रभु! ऐसे मुझ पापी का निर्वाह करना तो आपका ही काम है।