(राग भैरव)
अब तो श्रीजी कृपा करो !
भ्रम्यो बहुत दुख पाय जगत में चरन न चित्त धरो ।। [1]
जानि अजान शरन मोहि दीन्हीं खोटो करो खरो ।
अपने कृत्य को आप सम्हारो अब कित देखि डरो ।। [2]
जाऊ कहाँ सब नाम पूछि है कौन कहां ते आयो ।
मोहि कहत अति लाज लागि हैं जैहैं नाम लजायो ।। [3]
सुनि हैं सकल लोग पुरवासी हाँसी सब को आवै ।
'पीताम्बर' श्रीरसिकराय को काहे को दुख पावै ।। [4]
- श्री पीतांबर देव जी, श्री पीतांबर देव जी की बानी (2)
हे श्रीजी [राधा] अब मुझपर कृपा करो ।अनंत जन्मों से भटक कर मैं दुःख पाता रहा परंतु मैंने तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण नहीं की । [1]
मुझे बेसहारा जान कर आपने मुझे अपनी शरण प्रदान कर मुझ जैसे खोटे को भी खरा कर दिया । आप करूणानिधि हैं, अकारण कृपा करनेवाली हैं, आप अपने इस स्वाभाव का निर्वाह क्यों नहीं करतीं, अब क्यों मेरे कर्मों को देख कर आपको भय लग रहा है । [2]
मैं कहाँ जाऊँ, सब मेरा नाम पूछते हैं और कौन एवं कहाँ से आया है ऐसा पूछते हैं । परंतु मुझे कहने में अति लज्जा अनुभव होती है, यदि मैंने अपना यह परिचय किसी को दे दिया तो नाम भी लज्जित हो जायेगा । [3]
समस्त लोग मेरा नाम पीताम्बरदास (श्रीहरि का दास) सुनकर मुझपर हंसते हैं । श्री पीताम्बर देव जी कहते हैं कि मैं तो श्री रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी का जन हूँ, फिर मैं काहे को दुःख पाऊँ ? [4]
अब तो श्रीजी कृपा करो !
भ्रम्यो बहुत दुख पाय जगत में चरन न चित्त धरो ।। [1]
जानि अजान शरन मोहि दीन्हीं खोटो करो खरो ।
अपने कृत्य को आप सम्हारो अब कित देखि डरो ।। [2]
जाऊ कहाँ सब नाम पूछि है कौन कहां ते आयो ।
मोहि कहत अति लाज लागि हैं जैहैं नाम लजायो ।। [3]
सुनि हैं सकल लोग पुरवासी हाँसी सब को आवै ।
'पीताम्बर' श्रीरसिकराय को काहे को दुख पावै ।। [4]
- श्री पीतांबर देव जी, श्री पीतांबर देव जी की बानी (2)
हे श्रीजी [राधा] अब मुझपर कृपा करो ।अनंत जन्मों से भटक कर मैं दुःख पाता रहा परंतु मैंने तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण नहीं की । [1]
मुझे बेसहारा जान कर आपने मुझे अपनी शरण प्रदान कर मुझ जैसे खोटे को भी खरा कर दिया । आप करूणानिधि हैं, अकारण कृपा करनेवाली हैं, आप अपने इस स्वाभाव का निर्वाह क्यों नहीं करतीं, अब क्यों मेरे कर्मों को देख कर आपको भय लग रहा है । [2]
मैं कहाँ जाऊँ, सब मेरा नाम पूछते हैं और कौन एवं कहाँ से आया है ऐसा पूछते हैं । परंतु मुझे कहने में अति लज्जा अनुभव होती है, यदि मैंने अपना यह परिचय किसी को दे दिया तो नाम भी लज्जित हो जायेगा । [3]
समस्त लोग मेरा नाम पीताम्बरदास (श्रीहरि का दास) सुनकर मुझपर हंसते हैं । श्री पीताम्बर देव जी कहते हैं कि मैं तो श्री रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी का जन हूँ, फिर मैं काहे को दुःख पाऊँ ? [4]

