त्वमेव स्वपदाम्भोज रस-चर्त्मनि - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (25)

त्वमेव स्वपदाम्भोज रस-चर्त्मनि - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (25)

त्वमेव स्वपदाम्भोज रस-चर्त्मनि मे मतिम् ।
नीतवत्य स्वकारुण्यात्पूर्णशा न करोषि किम ।।

- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (25)

हे स्वामिनि [राधे]! केवल आपके ही चरण-कमलों के रस में मेरी मति रमण करती रहती है, तब आपकी करुणा-दृष्टि से अभिसिञ्चित होने की मेरी आशा को आप पूर्ण न करेंगी क्या?