राधे प्यारी तें मोहन वस कीनौं - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (25)

राधे प्यारी तें मोहन वस कीनौं - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (25)

(राग धनाश्री)
राधे प्यारी तें मोहन वस कीनौं ।
सकल लोक जाकैं वस वरतै सो तेरेँ आधीनौं ॥ [1]
नाचत गावत वेन वजावत तोसो सरवस हीनो ।
रसना अंग रूप रस चितवनि तेरे ही रंग भीनों ॥[2]
तू कित पढी यहै कमनेती करि राख्यौ लय-लीनौं ।
रूप रसिक कहि देहु हमहिं वलि यह महतई कौ मीनों ॥ [3]

- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (25)

हे श्री राधे प्यारी! आपने तो श्याम सुंदर को नित्य ही अपने वश में कर रखा है । समस्त लोक जिनके वश में हैं वही श्यामसुन्दर भगवान श्री कृष्ण आपके आधीन हैं । [1]

श्री श्यामसुन्दर तुम्हें प्रसन्न करने हेतु तुम्हारे समक्ष नाचते हैं, गाते हैं, अपनी मुरली में श्री राधे नाम का गान करते हैं और अपना सर्वस्व तुमपर नयौछावर कर देते हैं । उनका अंग अंग, रसना, तुम्हारे रूप के रस में डूबे हुए हैं और तुम्हारे ही प्रेम के रंग में भीगा रहता है । [2]

हे प्यारी, ऐसी नेत्रों (एवं भृकुटी) द्वारा तीर चलाने की अद्बुत विद्या कहाँ से सीखी है कि श्री श्यामसुंदर को मानो तुमने नित्य ही अपना दास बना रखा है । श्री रूप रसिक देवाचार्य जी कहते हैं कि ऐसे अद्बुत गुमान से भरे नेत्रों की तीक्ष्ण कटाक्ष की शोभा में मेरा हृदय रूपी मीन भी फँस जाए (ऐसी कामना है) । [3]