प्रेमी जन देख देख होते हैं प्रसन्न जिसे - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (22)

प्रेमी जन देख देख होते हैं प्रसन्न जिसे - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (22)

(कवित्त)
प्रेमी जन देख देख होते हैं प्रसन्न जिसे,
प्रेम परिपूर्ण जहाँ पृथ्वी में पवन में। [1]
करती प्रणाम मानो वसुधा को छूती हुई,
चित्त फँस जाता कुञ्ज लतिका सघन में॥ [2]
आगये स्वयं प्रगट होके श्रीविहारीलाल,
कैसा था प्रभाव हरिदास के भजन में। [3]
अंगजा समस्त सहचरियों को साथ लिये,
करते विहार बिहारी जी निधिबन में॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (22)

वृंदावन धाम में स्थित यह दिव्य श्री निधिवन राज, जहाँ के दर्शन से प्रेमीजन अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं, और जहाँ की भूमि और वायु में प्रेम की वर्षा होती रहती है। [1]

ऐसा प्रतीत होता है मानो यहाँ के वृक्ष और लताएँ इस पावन भूमि को स्पर्श करते हुए नित्य प्रणाम कर रही हैं। इन सघन लताओं से घिरे कुंजों में विचरते ही मन यहाँ बंध सा जाता है। [2]

अनन्य भक्त स्वामी श्री हरिदास जी महाराज के भजन की ऐसी अलौकिक शक्ति थी कि स्वयं श्री बाँके बिहारी लाल वहाँ प्रकट हो गए। [3]

डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती जी कहते हैं कि यहाँ वृंदावन के निधिवन में समस्त सखियों के साथ श्री बाँके बिहारी जी नित्य विहार करते हैं। [4]