श्री बैकुंठ गोलोक लों, गए परम रस चाह ।
फिर आए वृंदाविपिन, सबको सुख अवगाह ॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (93)
परम रस की खोज में अनेक जन श्री वैकुण्ठ और गोलोक तक गए, किन्तु उस रस की पूर्ण तृप्ति न पाकर वे पुनः श्री वृन्दावन धाम लौट आए। यह वृन्दावन वह पावन स्थान है जहाँ प्रिया-प्रियतम के अगाध विहार रस का अनुभव होता है।
फिर आए वृंदाविपिन, सबको सुख अवगाह ॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (93)
परम रस की खोज में अनेक जन श्री वैकुण्ठ और गोलोक तक गए, किन्तु उस रस की पूर्ण तृप्ति न पाकर वे पुनः श्री वृन्दावन धाम लौट आए। यह वृन्दावन वह पावन स्थान है जहाँ प्रिया-प्रियतम के अगाध विहार रस का अनुभव होता है।

