लड़ैती मेरी प्रानजीवन धन प्यारी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (144)

लड़ैती मेरी प्रानजीवन धन प्यारी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (144)

लड़ैती मेरी प्रानजीवन धन प्यारी ।
तनहुँ लड़ैती मनहु लड़ैती
छिन हूँ होत न न्यारी ॥ [1]
कुंज महल में सदाई राजैं
लालन के उरहारी ।
श्री हरिदासी ललितकिसोरी
या रस की अधिकारी ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (144)

श्री लड़ैती जू [राधा] ही मेरी प्रान जीवन धन प्यारी हैं । मेरा तन भी श्री राधा है मेरा मन भी श्री राधा है, एक क्षण को भी श्री राधा रानी मेरे से विलग नहीं होती । [1]

कुंज महल में श्री प्यारी जू सदा ही श्री लाल जी [कृष्ण] के हृदय का हार बनकर विराजती हैं । श्री ललित किशोरिजी कहते हैं कि प्रिया लाल की इस अद्बुत केलि रस का अधिकारी तो स्वामी श्री हरिदास का कोई निज कृपा पात्र जन ही हो सकता है । [2]