(कवित्त)
मोर जो बनइओ तो बनइओ श्री वृंदावन को,
नाच नाच, कूक कूक तुम्हीं को रिझाऊँगो। [1]
बंदर बनइओ तो बनइओ श्री निधिवन को,
कूद कूद डारन पे जोर को दिखाऊँगो॥ [2]
भिक्षुक बनइओ तो बनइओ वृंदावन को,
माँग माँग टूक ब्रिजवासिन सों खाऊँगो। [3]
कोकिला करो या कीर, करो कालिंदी के तीर,
आठों याम श्यामा श्याम, श्यामा श्याम गाऊँगो॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
हे प्रभु! यदि मुझे मोर बनाना हो, तो वृंदावन का मोर बनाना, जिससे मैं नाच-नाच कर और कूक-कूक कर तुम्हें ही रिझाया करूँगा। [1]
मोर जो बनइओ तो बनइओ श्री वृंदावन को,
नाच नाच, कूक कूक तुम्हीं को रिझाऊँगो। [1]
बंदर बनइओ तो बनइओ श्री निधिवन को,
कूद कूद डारन पे जोर को दिखाऊँगो॥ [2]
भिक्षुक बनइओ तो बनइओ वृंदावन को,
माँग माँग टूक ब्रिजवासिन सों खाऊँगो। [3]
कोकिला करो या कीर, करो कालिंदी के तीर,
आठों याम श्यामा श्याम, श्यामा श्याम गाऊँगो॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
हे प्रभु! यदि मुझे मोर बनाना हो, तो वृंदावन का मोर बनाना, जिससे मैं नाच-नाच कर और कूक-कूक कर तुम्हें ही रिझाया करूँगा। [1]
यदि मुझे बंदर बनाना हो, तो श्री निधिवन का ही बनाना, जिससे मैं वृंदावन के वृक्षों और डालियों पर कूद-कूद कर तुम्हारे पास ही रह सकूँगा। [2]
यदि मुझे भिक्षुक बनाना हो, तो वृंदावन का ही बनाना, जिससे मैं ब्रजवासियों के घर-घर जाकर टूक माँगकर अपना जीवन यापन करूँ। [3]
अगर मुझे कोकिला या तोता बनाना हो, तो मुझे यमुना के किनारे वृंदावन में बनाना, जिससे मैं दिन-रात "श्यामा श्याम" का नाम लेता रहूँ। [4]

