केलि माधुरी सिंधु के, कोऊ न पावत पार ।
मन वच क्रम निशि दिन सदा, जीय विचारी विचारी॥
- श्री माधुरी दास, केलि माधुरी (125)
वृन्दावन की इस अगाध केलि-माधुरी के सिंधु का कोई भी पार नहीं पा सकता, चाहे मन, वचन और कर्म से कोई निशि-दिन इसका निरंतर चिंतन करता रहे।
मन वच क्रम निशि दिन सदा, जीय विचारी विचारी॥
- श्री माधुरी दास, केलि माधुरी (125)
वृन्दावन की इस अगाध केलि-माधुरी के सिंधु का कोई भी पार नहीं पा सकता, चाहे मन, वचन और कर्म से कोई निशि-दिन इसका निरंतर चिंतन करता रहे।

