(सवैया)
ए विधना यह कीनौं कहा अरे, मोमत प्रेम उमंग भरी क्यौं। [1]
प्रेम उमंग भरी तो भरी हुती, सुन्दर रूप करयौ तैं हरी क्यौं॥ [2]
सुन्दर रूप करयौ तो करयौ तामें, ‘नागर’ एती अदायें धरी क्यौं। [3]
जो पै अदायें धरी तो धरी पर, ए अँखियाँ रिझवार करी क्यौं॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (56)
हे विधाता! यह तूने क्या कर दिया? मेरे हृदय में तूने ऐसी प्रेम-लहर क्यों जगा दी? [1]
यदि प्रेम की लहर जगा दी तो जगा दी, पर फिर श्री श्यामसुंदर का इतना अनुपम रूप क्यों रचा? [2]
अगर वह सुंदर रूप रचा तो रचा, पर उस छलिया नागर को ऐसी मनोहर अदाएँ क्यों दे दीं? [3]
और यदि उसे वे अदाएँ भी दे दीं, तो फिर ये आँखें मन हर लेने वाली क्यों बना दीं? [4]
ए विधना यह कीनौं कहा अरे, मोमत प्रेम उमंग भरी क्यौं। [1]
प्रेम उमंग भरी तो भरी हुती, सुन्दर रूप करयौ तैं हरी क्यौं॥ [2]
सुन्दर रूप करयौ तो करयौ तामें, ‘नागर’ एती अदायें धरी क्यौं। [3]
जो पै अदायें धरी तो धरी पर, ए अँखियाँ रिझवार करी क्यौं॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (56)
हे विधाता! यह तूने क्या कर दिया? मेरे हृदय में तूने ऐसी प्रेम-लहर क्यों जगा दी? [1]
यदि प्रेम की लहर जगा दी तो जगा दी, पर फिर श्री श्यामसुंदर का इतना अनुपम रूप क्यों रचा? [2]
अगर वह सुंदर रूप रचा तो रचा, पर उस छलिया नागर को ऐसी मनोहर अदाएँ क्यों दे दीं? [3]
और यदि उसे वे अदाएँ भी दे दीं, तो फिर ये आँखें मन हर लेने वाली क्यों बना दीं? [4]

