श्यामा जू अब मैं अति अकुलायौ - श्री किशोरी अलि

श्यामा जू अब मैं अति अकुलायौ - श्री किशोरी अलि

श्यामा जू अब मैं अति अकुलायौ ।
तन मन के दुख सहे जात नहीं तातें तुमहिं बुलायौ ॥ [1]
शरण पड़े की लाज निबहियौ और न बनत बनायौ।
'अलि किशोरी' जाऊँ कहाँ अब बड़ौ ठिकानौ पायौ ॥ [2]

- श्री किशोरी अलि

हे श्यामा जू, मैं अब अति अकुला गया हूँ । तन, मन के दुःख अब मुझसे सहे नहीं जाते इसी कारण तुमको अब पुकार रहा हूँ । [1]

कृपया मेरी रक्षा करें क्योंकि मैं आपकी शरण में हूं; मेरे पास अन्य कोई आश्रय स्वप्न में भी नहीं है । श्री किशोरी अलि कहते हैं, अब मैं आपका द्वार छोड़कर कहां जाऊं, जो वास्तव में सर्वोच्च द्वार है। [2]