(राग भैरवी-ताल कहरवा)
जिह्वा के मम अग्रभाग पर रहे विराजित राधा नाम । [1]
मेरी आँखों के सम्मुख नित रहे राधिका रूप ललाम ॥ [2]
कानों में नित रहे गूँजती राधा-कीर्ति-कथा अभिराम । [3]
बना रहे श्रीश्रीराधाका गुण-गण-चिन्तन मन अविराम ॥ [4]
- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर (545)
मेरी जिह्वा के अग्रभाग पर सदा “श्रीराधा” नाम विराजमान रहे । [1]
मेरे नेत्रों के समक्ष सदा श्रीराधा का ही सुंदर रूप प्रकाशित हो । [2]
कानों में श्रीराधिका की कीर्ति-कथा गूंजती रहे । [3]
मेरे मन में श्रीराधा का ही गुणगण चिंतन हो । [4]
जिह्वा के मम अग्रभाग पर रहे विराजित राधा नाम । [1]
मेरी आँखों के सम्मुख नित रहे राधिका रूप ललाम ॥ [2]
कानों में नित रहे गूँजती राधा-कीर्ति-कथा अभिराम । [3]
बना रहे श्रीश्रीराधाका गुण-गण-चिन्तन मन अविराम ॥ [4]
- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर (545)
मेरी जिह्वा के अग्रभाग पर सदा “श्रीराधा” नाम विराजमान रहे । [1]
मेरे नेत्रों के समक्ष सदा श्रीराधा का ही सुंदर रूप प्रकाशित हो । [2]
कानों में श्रीराधिका की कीर्ति-कथा गूंजती रहे । [3]
मेरे मन में श्रीराधा का ही गुणगण चिंतन हो । [4]

