जाकौं दरसन इत मिलै - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (21)

जाकौं दरसन इत मिलै - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (21)

जाकौं दरसन इत मिलै, ताकौं दरसन उत्त ।
जाकौ दरसन इत नहीं, ताकौ मिलै न उत्त ॥ [1]
ताकौं मिलै न उत्त, फिरै भटकत सब ठौरनि ।
मनकौ मैल न जाइ, खात घर-घर के कौरनि ॥ [2]
भगवत रसिकन संग, मुकुर लौं माँजै ताकौं ।
तब निज बदन दिखाय, स्याम-स्यामा कौ जाकौं ॥ [3]

- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (21)

जिस मनुष्य को इस संसार में सर्वत्र राधा कृष्ण की झलक दिखाई देती है, केवल उसे ही मरने के बाद दिव्य वृन्दावन में राधा कृष्ण का साक्षात्कार होता है । इस भ्रम में मत रहना कि उनकी भक्ति एवं साक्षात्कार किये बिना, मरने पर कुछ मिल जायेगा । [1]

ऐसा व्यक्ति भले ही स्थान-स्थान पर (अथवा तीर्थों में) भटकता फिरे, भले ही घर-घर (भिन्न–भिन्न मत–सम्प्रदायों में) झूठन चाटता फिरे, उसके मन से काम-क्रोधादि वासनाओं का मैल दूर नहीं हो सकता । [2]

श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि पहले मनदर्पण को रसिकों की संगति से माँजकर निर्मल करना चाहिए (काम-क्रोध आदि वासनाओं को दूर करना चाहिए), तभी अपना निज सखी स्वरुप, जो श्री श्यामाश्याम की नित्य दासी है, उस मन-दर्पण में दिखाई देगा । (जिस प्रकार स्वच्छ दर्पण में मुख दिखाई देता है, उसी प्रकार निर्मल मन में ही श्यामा-श्याम की रूप-माधुरी प्रतिबिम्बित होती है)। [3]