अब तो भई राधा चरण गुलाम - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (130)

अब तो भई राधा चरण गुलाम - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (130)

(राग कामोद, त्रिताल)
अब तो भई राधा चरण गुलाम ।
सदा बिकी अब इन चरनन में, दासी हूँ बेदाम ॥ [1]
वृन्दावन में निशिदिन डोलूँ, जप्यौ करूँ श्रीराधा नाम ।
तुम ही गति हो तुम ही मति हो, तुमसों नातो तुम सों काम ॥ [2]
तुम्ही इक अवलम्ब लाड़ली, सुख सिन्धू अभिराम ।
श्रीगोपालहित हरी स्वामिनी, अब तो लेना थाम ॥ [3]

- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (130)

श्री हित गोपाल दास जी कह रहे हैं की हे श्री राधा, अब तो मैं आपकी गुलाम हो गयी हूँ । आपके चरण कमलों पर मैं सदा के लिए बिक गयी हूँ, और बिना मूल्य के इनकी दासी बन गयी हूँ । [1]

हे श्री राधे, अब मैं निशिदि केवल वृंदावन धाम में ही विचरण करना चाहती हूँ और श्री राधा नाम को ही जपना चाहती हूँ क्यूँकि आपही मेरी गति हो, आपही मेरी मति हो, एकमात्र आपसे ही अब मेरा नाता है, और आपसे ही सब काम है । [2]

हे सुख की खान लाड़िली जू, एकमात्र आपही मेरा अवलंभ हो । श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं कि हे श्री राधे, अब तो मेरा हाथ पकड़ लीजिए और सदा के लिए अपनी सेवा प्रदान कीजिये । [3]