प्यारी तेरे तन की सोभा बरनी न जाइ - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (181)

प्यारी तेरे तन की सोभा बरनी न जाइ - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (181)

(राग सारंग)
प्यारी तेरे तन की सोभा बरनी न जाइ ।
जा जा अंग निरखत ए नैना तहीं तहीं रहत लुभाइ ॥ [1]
नवल रूप अनूप माधुरी पान करत न अघाई ।
श्रीबिहारीबिहारनिदासि अंग संग नख सिख रही हो समाइ ॥ [2]

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (181)

हे प्यारी जू, आपके अंग की शोभा अवर्णनीय है, क्यूंकि आपके जिस अंग का दर्शन मेरी आंखें करती हैं, वहीँ पर लुभायमान होकर अपलक टिक जाती हैं । [1]

श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि आपके अनुपम नित्य नवीन रूप माधुरी का पान करते हुए भी कभी मेरी आंखों को तृप्ति नहीं मिलती, जिनमें [आँखों में] बिहारीजी के संग आपके नख-शिख की छवि नित्य ही समाइ हुई है । [2]