वृंदावन हरि यही विधि क्रीड़त, सदा राधिका संग ।
भोर निसा कबहूँ नहिं जानत, सदा रहत यक रंग॥
- श्री सूरदास
श्री कृष्ण सदा श्री राधिका के साथ वृन्दावन में प्रेम-केलि में निमग्न रहते हैं। उन्हें न भोर का ज्ञान रहता है, न रात्रि का भान; वे निरंतर एक ही दिव्य रस-रंग में तल्लीन और उन्मत्त बने रहते हैं।
भोर निसा कबहूँ नहिं जानत, सदा रहत यक रंग॥
- श्री सूरदास
श्री कृष्ण सदा श्री राधिका के साथ वृन्दावन में प्रेम-केलि में निमग्न रहते हैं। उन्हें न भोर का ज्ञान रहता है, न रात्रि का भान; वे निरंतर एक ही दिव्य रस-रंग में तल्लीन और उन्मत्त बने रहते हैं।

