रस-बस छकि दंपति दुहूँ, कीने बिबिध बिलास - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (55)

रस-बस छकि दंपति दुहूँ, कीने बिबिध बिलास - श्री ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (55)

रस-बस छकि दंपति दुहूँ, कीने बिबिध बिलास ।
सो सुमरन करि करि बढ़े, हिय में अधिक हुलास ॥

- श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (55)

दिव्य दम्पति श्री राधा-कृष्ण प्रेम-रस में पूर्णत: तृप्त होकर अनेक प्रकार की केलियाँ कर रहे हैं। जो साधक इस युगल का मन लगाकर सुमिरन करता है, उसके हृदय में आनंद स्वतः उमड़ने लगता है और उसका रस क्षण-क्षण प्रगाढ़ होता जाता है।