जगत में जागै जाको भाग ।
ताके हिये उपजत वृन्दावन दर्शन को अनुराग । [1]
तृण सम तजै सकल सुख सम्पति बाढ़े विषय - विराग ॥
श्रीवनवास करन चित्त चाहत पाय अलोनो साग । [2]
'केलि - सखि' घनश्याम कुञ्ज लखि बुझत विरह की आग ॥ [3]
- श्री केलि सखि जी
संसार में जिसका भाग्योदय होता है, उसके ह्रदय में श्री वृन्दावन के दर्शन के लिए अनुराग होने लगता है । [1]
ऐसे अनुरागी भक्त के ह्रदय में विषयों से वैराग्य बढ़ता जाता है और वह समस्त सुख-सम्पति को तृण के समान त्याग देता है।
उसके चित्त में श्री वृन्दावन के वास के प्रति चाह प्रकट हो उठती है और उसकी पूर्ति के हेतु भले ही उसे बिना नमक के साग ही क्यों न मिले, वह उसमें भी संतुष्ट रहता है । [2]
श्री केलि सखी जी कहते हैं कि श्री कृष्ण के कुञ्ज के दर्शन करने के पश्चात ही उसकी विरह की अग्नि शांत होती है । [3]
ताके हिये उपजत वृन्दावन दर्शन को अनुराग । [1]
तृण सम तजै सकल सुख सम्पति बाढ़े विषय - विराग ॥
श्रीवनवास करन चित्त चाहत पाय अलोनो साग । [2]
'केलि - सखि' घनश्याम कुञ्ज लखि बुझत विरह की आग ॥ [3]
- श्री केलि सखि जी
संसार में जिसका भाग्योदय होता है, उसके ह्रदय में श्री वृन्दावन के दर्शन के लिए अनुराग होने लगता है । [1]
ऐसे अनुरागी भक्त के ह्रदय में विषयों से वैराग्य बढ़ता जाता है और वह समस्त सुख-सम्पति को तृण के समान त्याग देता है।
उसके चित्त में श्री वृन्दावन के वास के प्रति चाह प्रकट हो उठती है और उसकी पूर्ति के हेतु भले ही उसे बिना नमक के साग ही क्यों न मिले, वह उसमें भी संतुष्ट रहता है । [2]
श्री केलि सखी जी कहते हैं कि श्री कृष्ण के कुञ्ज के दर्शन करने के पश्चात ही उसकी विरह की अग्नि शांत होती है । [3]

