तन छूटै तो परम सुख, रहै तो भजन अपार - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (193)

तन छूटै तो परम सुख, रहै तो भजन अपार - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (193)

तन छूटै तो परम सुख, रहै तो भजन अपार ।
श्रीकुंजबिहारिनी लाड़िली, जीवनि प्रान आधार॥

- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (193)

जिन साधकों ने श्री कुंजबिहारिनी लाड़िली जू श्री राधा को अपने जीवन और प्राणों का आधार बना लिया है, उनके लिए देह-त्याग परम आनंद का कारण बनता है; और जब तक देह रहती है, वे अपार भजन-रस में मग्न होकर उन्मत्त से रहते हैं।