लीला :
नन्दगाँव के इस मोर वन में श्री कृष्ण अपनी गायों को चराने आते थे और मोर कुंड पर उन्हें पानी पिलाते थे ।
एक दिन श्री राधारानी अपने प्रिय मोर के संग यहाँ आयीं । श्री राधा ने श्री कृष्ण से कहा "क्या आप मेरे मोर के संग नृत्य करेंगे", श्री कृष्ण ने कहा "अरे यह तो एक पक्षी है, मेरे संग कैसे नृत्य करेगा"। इसपर श्री राधा ने कहा "यह मेरा मोर है, भली प्रकार से नृत्य करना जनता है", श्री कृष्ण ने कहा "ठीक है"। इसके बाद श्री राधारानी ने अपने मोर के पीठ पर अपना कर कमल पधराया जिससे मोर के अंदर नृत्य कला शक्ति का संचार हो गया और श्री कृष्ण का मोर के संग नृत्य आरम्भ हो गया । श्री राधा की कृपा से नृत्य में मोर की विजय हुई और श्री कृष्ण की हार । नृत्य के मध्य मोर का एक पंख टूट कर भूमि पर गिर गया था । उस मोर पंख को श्री राधारानी का प्रसाद समझकर श्री कृष्ण ने उठा लिया और सदा के लिए अपने मुकुट में धारण कर लिया । तब श्री कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए श्री राधा ने उनके संग इसी स्थान पर मोर बनकर रास नृत्य किया था जिससे इस वन का नाम मोर वन हुआ और कुंड का नाम मोर कुंड हुआ । इस अद्भुत रास नृत्य का दर्शन करने स्वयं भगवान शिव आये थे । पास ही में शिव जी का मंदिर कोंकेश्वर महादेव स्थित है ।
नन्दगाँव के 56 कुंडों में मोर कुंड भी है ।
स्थान :
श्री मोर बिहारी जी का मंदिर मोर वन में कृष्ण कुंड के समीप, कोसी मार्ग, नन्दगाँव में स्थित है ।
नन्दगाँव के इस मोर वन में श्री कृष्ण अपनी गायों को चराने आते थे और मोर कुंड पर उन्हें पानी पिलाते थे ।
एक दिन श्री राधारानी अपने प्रिय मोर के संग यहाँ आयीं । श्री राधा ने श्री कृष्ण से कहा "क्या आप मेरे मोर के संग नृत्य करेंगे", श्री कृष्ण ने कहा "अरे यह तो एक पक्षी है, मेरे संग कैसे नृत्य करेगा"। इसपर श्री राधा ने कहा "यह मेरा मोर है, भली प्रकार से नृत्य करना जनता है", श्री कृष्ण ने कहा "ठीक है"। इसके बाद श्री राधारानी ने अपने मोर के पीठ पर अपना कर कमल पधराया जिससे मोर के अंदर नृत्य कला शक्ति का संचार हो गया और श्री कृष्ण का मोर के संग नृत्य आरम्भ हो गया । श्री राधा की कृपा से नृत्य में मोर की विजय हुई और श्री कृष्ण की हार । नृत्य के मध्य मोर का एक पंख टूट कर भूमि पर गिर गया था । उस मोर पंख को श्री राधारानी का प्रसाद समझकर श्री कृष्ण ने उठा लिया और सदा के लिए अपने मुकुट में धारण कर लिया । तब श्री कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए श्री राधा ने उनके संग इसी स्थान पर मोर बनकर रास नृत्य किया था जिससे इस वन का नाम मोर वन हुआ और कुंड का नाम मोर कुंड हुआ । इस अद्भुत रास नृत्य का दर्शन करने स्वयं भगवान शिव आये थे । पास ही में शिव जी का मंदिर कोंकेश्वर महादेव स्थित है ।
नन्दगाँव के 56 कुंडों में मोर कुंड भी है ।
स्थान :
श्री मोर बिहारी जी का मंदिर मोर वन में कृष्ण कुंड के समीप, कोसी मार्ग, नन्दगाँव में स्थित है ।

