(राग भुपाली व मालव)
नाँचत मोहन संग राधिका ब्रज जुवतिन के जूथ लिए ।
बाहु परसपर जोरी प्रेम बस, मुदित गंड पर गंड दियें ॥ [1]
कंकन कुनित रुनित बर नूपुर, सुनत श्रवण खग उपरनियें ।
बाजत ताल रसाल सरस गति, मालव राग सुदेस गियें ॥ [2]
सुघर संगीत प्रबिन नागरी, तिरप लेत आनन्द हियें ।
लटकत सीस सुभग पग पटकट, वदत श्याम हो-होव कियें ॥ [3]
सुख भर भरित परस्पर मंडल, सस्मित रस लोचनन पियें ।
जै श्री कृष्णदास हित वदत सदा यह, वृथा कहा सत कल्प जियें ॥ [4]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (640)
श्री राधिका सखी समूह को लिए मनमोहन श्री कृष्ण के संग नृत्य कर रही हैं । युगल जोरि श्री श्यामाश्याम प्रेम से भरकर एक-दूसरे को गलबाँही दिए हुए हैं । [1]
भुजाओं में कंकण और चरणों में नूपुर मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रहे हैं जिसे सुनकर पक्षीगण युगल जोरि के ऊपर मंडलाकार आकृति में उड़ते हुए बहुत ही मधुर और मनमोहक ताल में मालव राग गा रहे हैं । [2]
श्री राधा सुंदर गान कला में प्रवीण हैं और आनंदित हृदय से एक तान गा रही हैं । गान के मध्य जब श्री राधा का मुख कमल कुछ झुकता है और उनके चरण कमल तान से हिलते हैं, तो श्री श्यामसुन्दर उनकी सुन्दर गति की प्रशंसा करते हैं । [3]
सखीयों का पूरा समूह आनंद से भर गया है; आनंद से भरी सबकी आंखें प्रेम रस का पान कर रही हैं । श्री कृष्णदास जी कहते हैं सदा के लिए इस लीला रस का पान करते रहो, वृथा में सैकड़ों कल्पों तक जीने का क्या लाभ है? [4]
नाँचत मोहन संग राधिका ब्रज जुवतिन के जूथ लिए ।
बाहु परसपर जोरी प्रेम बस, मुदित गंड पर गंड दियें ॥ [1]
कंकन कुनित रुनित बर नूपुर, सुनत श्रवण खग उपरनियें ।
बाजत ताल रसाल सरस गति, मालव राग सुदेस गियें ॥ [2]
सुघर संगीत प्रबिन नागरी, तिरप लेत आनन्द हियें ।
लटकत सीस सुभग पग पटकट, वदत श्याम हो-होव कियें ॥ [3]
सुख भर भरित परस्पर मंडल, सस्मित रस लोचनन पियें ।
जै श्री कृष्णदास हित वदत सदा यह, वृथा कहा सत कल्प जियें ॥ [4]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (640)
श्री राधिका सखी समूह को लिए मनमोहन श्री कृष्ण के संग नृत्य कर रही हैं । युगल जोरि श्री श्यामाश्याम प्रेम से भरकर एक-दूसरे को गलबाँही दिए हुए हैं । [1]
भुजाओं में कंकण और चरणों में नूपुर मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रहे हैं जिसे सुनकर पक्षीगण युगल जोरि के ऊपर मंडलाकार आकृति में उड़ते हुए बहुत ही मधुर और मनमोहक ताल में मालव राग गा रहे हैं । [2]
श्री राधा सुंदर गान कला में प्रवीण हैं और आनंदित हृदय से एक तान गा रही हैं । गान के मध्य जब श्री राधा का मुख कमल कुछ झुकता है और उनके चरण कमल तान से हिलते हैं, तो श्री श्यामसुन्दर उनकी सुन्दर गति की प्रशंसा करते हैं । [3]
सखीयों का पूरा समूह आनंद से भर गया है; आनंद से भरी सबकी आंखें प्रेम रस का पान कर रही हैं । श्री कृष्णदास जी कहते हैं सदा के लिए इस लीला रस का पान करते रहो, वृथा में सैकड़ों कल्पों तक जीने का क्या लाभ है? [4]

