राधा परम निर्मल नारि - श्री सूरदास, सूरसागर (10.1843)

राधा परम निर्मल नारि - श्री सूरदास, सूरसागर (10.1843)

(राग बिहागरौ)
राधा परम निर्मल नारि ।
कहति हौ मन कर्मना करि, हृदय दुविधा टारि ॥ [1]
स्याम कौ इक तुही जान्यौ, दुराचारिनि और ।
जैसे घट पूरन न डोलै, अध भरौ डगडौर ॥ [2]
धनी धन कबहूँ न प्रगटै, धरै ताहि छपाइ ।
है महानग स्याम पायौ, प्रगटि कैसै जाइ ॥ [3]
कहति हौ यह बात तोसौ, प्रगट करिहौ नाहिं ।
‘सूर’ सखी सुजान राधा, परसपर मुसुकाहिं ॥ [4]

- श्री सूरदास, सूरसागर (10.1843)

हे श्री राधा, आप परम निर्मल नारी हैं, यह मैं ह्रदय में बिना किसी दुविधा के, मन तथा कर्म से कहती हूँ । [1]

केवल आप ही श्री श्यामसुंदर के मन की अवस्था को जानने वाली हैं, अन्य सब दुराचारिणी नारी हैं । जैसे जल से भरी हुई मटकी हिलती नहीं लेकिन आधी भरी हुई मटकी छलकने लगती है एवं उसका जल बाहर गिरने लगता है । [2]

धनवान व्यक्ति अपने धन को किसी के सामने कभी प्रगट नहीं करता, उसे छुपा कर रखता है, उसी प्रकार जिसने महाचूड़ामणि श्री कृष्ण को पा लिया है, वह उसे कैसे प्रगट करे ? [3]

अपने सखी स्वरुप में स्थित श्री सूरदास जी कहते हैं, "हे श्री राधा, मैं आपसे यह बात कहती हूँ की इसे प्रगट नहीं करना ।" यह कहते हुए सखी रूप में श्री सूरदास जी एवं सुजान श्री राधा परस्पर मुस्कुरा रहे हैं । [4]