खटकौ नहीं उसास को, ना काहू सौं भाव ।
गौर स्याम मन में अरे , लख आवहु लख जाव ॥
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (10)
श्री रसिक देव जी को न जीवन-मरण की चिंता है, न ही सांसारिक संबंधों का आकर्षण। उनके मन में तो गौर-साँवले श्री राधा-कृष्ण ही बसे हैं; चाहे लाख लोग आएँ या चले जाएँ, उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं।
गौर स्याम मन में अरे , लख आवहु लख जाव ॥
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (10)
श्री रसिक देव जी को न जीवन-मरण की चिंता है, न ही सांसारिक संबंधों का आकर्षण। उनके मन में तो गौर-साँवले श्री राधा-कृष्ण ही बसे हैं; चाहे लाख लोग आएँ या चले जाएँ, उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं।

