दुविधा तब जैहै या मनकी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (224)

दुविधा तब जैहै या मनकी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (224)

(राग सारंग)
दुविधा तब जैहै या मनकी।
निर्भय ह्वै कैं जब सेवहुगे, रज श्रीवृंदावन की ॥ [1]
कामरि लै करवा जब लैहे, शीतल छाँह कुंजन की ।
अति उदार लीला गावहुगे, मोहन स्याम सुधन की ॥ [2]
इन पाँइनि परिकरमा दैहै, मथुरा गोवर्द्धन की ।
व्यास दास जब टेक पकरिहै ऐसे पावन पनकी ॥ [3]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (224)

मेरे मन की दुविधा तभी जाएगी जब मैं निर्भय होकर के इस वृंदावन रज का सेवन करूंगा । [1]

एक कंबल और एक करुवा हाथ में लेकर, शीतल कुंजों की छाया में, दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण को लाड़ लड़ाऊँगा एवं अति उदार लीला का गुणगान करूँगा । [2]

मैं ब्रज के पवित्र स्थानों जैसे मथुरा और गोवर्धन की परिक्रमा करते हुए इस परम पवित्र जीवन को इसी तरह जीने का दृढ़ संकल्प लेता हूं। [3]