विहाय वृन्दावनमिन्दिरादिभिः सुदुर्लभं कुत्र विमूढ़ यासि रे!।
सर्वेश्वरैश्वर्यमथामृतं परं सुदुर्लभाश्चात्र मिलन्ति भक्तयः॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.71)
अरे मूर्ख! लक्ष्मी आदि के लिये भी सुदुर्लभ (जहां महालक्ष्मी का भी प्रवेश नहीं) इस श्रीवृन्दावन को त्यागकर कहाँ जाता है? यहाँ ही तो सर्वाधीश्वर का ऐश्वर्य, परम अमृत एवं सुदुर्लभ भक्ति समूह मिलते हैं ।
सर्वेश्वरैश्वर्यमथामृतं परं सुदुर्लभाश्चात्र मिलन्ति भक्तयः॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.71)
अरे मूर्ख! लक्ष्मी आदि के लिये भी सुदुर्लभ (जहां महालक्ष्मी का भी प्रवेश नहीं) इस श्रीवृन्दावन को त्यागकर कहाँ जाता है? यहाँ ही तो सर्वाधीश्वर का ऐश्वर्य, परम अमृत एवं सुदुर्लभ भक्ति समूह मिलते हैं ।

