जय जय विपन विहारनि रानी - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, मंगल (11)

जय जय विपन विहारनि रानी - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, मंगल (11)

(राग भैरवी)
जय जय विपन विहारनि रानी ।
जिनकी दया दृष्टि पल माहों कर्म भर्म सब खोय निसानी ॥ [1]
तब पद महिमा सुनी अलौकिक तोरी लोकवेद कुलकानी ।
रसिक विहारी की जीवन धन वारि पिवै नित पानी ॥ [2]
तनमन परम पुष्ट पनपावै सरबस रसिकन की सुखदानी ।
अली माधुरी प्रेम रस बाढ़ै श्यामा चरन सरन में जानी ॥ [3]

- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, मंगल (11)

वृन्दावन विहारिणी श्री राधा की जय हो, जिनकी करुणा दृष्टि से क्षण भर में ही कर्म बंधन एवं भ्रम रुपी अंधकार नष्ट हो जाता है । [1]

हे श्री राधा, आपकी अलोकिक चरण महिमा का श्रवण कर लोक-वेद एवं कुल-परंपरा से मेरा सम्बन्ध टूट गया है । रसिक शिरोमणि श्री श्यामसुंदर का जीवन धन तो एक मात्र श्री राधा ही हैं । वे इन पर सब कुछ न्यौछावर करते हैं।। [2]

रसिकों को सब प्रकार से सुख प्रदान करने वाली श्री राधा ने मेरे तन-मन को परम-पुष्ट कर दिया है । श्री अली माधुरी जी कहते हैं "श्री श्यामा जू के चरण कमलों की शरण में आते ही मेरे ह्रदय में प्रेम-रस नित-प्रति बढ़ रहा है ।" [3]