हों व्रज मागनों जू व्रज तजि अंत न जाऊँ जू - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी, उपदेश पद (11)

हों व्रज मागनों जू व्रज तजि अंत न जाऊँ जू - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी, उपदेश पद (11)

हों व्रज मागनों जू । व्रज तजि अंत न जाऊँ जू ।।
बड़े बड़े भूपति भूतल में दाता सूर सुजान जू ।
कर न पसरों, सिर न नवाऊँ या ब्रज के अभिमान जू ।।

- श्री गदाधर भट्ट जी,  श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी, उपदेश पद (11)

मैं केवल ब्रज का वास माँगता हूँ और ब्रज को त्यागकर कभी कहीं नहीं जाऊँ। इस भूमंडल पर भले ही बड़े-बड़े धनवान, राजा, दानी और सुजान हों, परंतु न तो किसी के आगे हाथ फैलाऊँ और न ही किसी के आगे सिर झुकाऊँ। मैं इसी प्रकार ब्रज के बल पर इस अभिमान में नित्य रहूँ।