सोने ते सुरंग गोरी सौंधे सौं सुवास अति,
मृदुताई पर वारौं जेतिक सुमन री। [1]
रूप ही कौ रूप जगमगत सकल बन,
आरसी कौं आरसी लसत ऐसौ तन री॥ [2]
फैलि रही छबि-प्रभा जहाँ लौं बिराजै सभा,
'हित ध्रुव' चितै लाल भये है मगन री। [3]
प्राननिं के प्रान और नैंननिं के नैन मेरे,
रीझि-रीझि बार-बार कहै छवै चरन री॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (37)
वृन्दावनेश्वरी श्री राधा की गौरवर्णी अंग-कान्ति तप्त स्वर्ण की प्रभा से भी अधिक चमकदार और तेजस्वी है। उनके दिव्य अंगों की सुगंध ऐसी प्रतीत होती है मानो समस्त प्राकृतिक पुष्पों के परिमल को पीछे छोड़ दिया हो। उनकी अंगों की कोमलता ऐसी है कि पुष्पों की मृदुता भी इसके सामने फीकी जान पड़ती है। [1]
मृदुताई पर वारौं जेतिक सुमन री। [1]
रूप ही कौ रूप जगमगत सकल बन,
आरसी कौं आरसी लसत ऐसौ तन री॥ [2]
फैलि रही छबि-प्रभा जहाँ लौं बिराजै सभा,
'हित ध्रुव' चितै लाल भये है मगन री। [3]
प्राननिं के प्रान और नैंननिं के नैन मेरे,
रीझि-रीझि बार-बार कहै छवै चरन री॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (37)
वृन्दावनेश्वरी श्री राधा की गौरवर्णी अंग-कान्ति तप्त स्वर्ण की प्रभा से भी अधिक चमकदार और तेजस्वी है। उनके दिव्य अंगों की सुगंध ऐसी प्रतीत होती है मानो समस्त प्राकृतिक पुष्पों के परिमल को पीछे छोड़ दिया हो। उनकी अंगों की कोमलता ऐसी है कि पुष्पों की मृदुता भी इसके सामने फीकी जान पड़ती है। [1]
वृन्दावन उनके रूप की ज्योति से आलोकित होकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो दर्पण में दर्पण की आभा प्रतिबिंबित हो रही हो। [2]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि उस अनुपम सुंदरी की छवि-प्रभा समूचे सखि-मंडल पर व्याप्त है, और इस अद्भुत दृश्य को देखकर श्री लाल आनंद से भर उठे हैं। [3]
श्री लाल जी कहते हैं कि मेरे प्राणों के आधार और नयनों के नयन, बार-बार मोहित होकर मुझे प्रेरित कर रहे हैं कि मैं श्री लाड़िली के रूप-रसमय चरणों को स्पर्श करने की अभिलाषा करूं। [4]

