नस्वर रज लगि जूझई, नस्वर पूत कहाइ ।
श्रीवृन्दावन सेये रहैं, सो रज माहिं समाइ ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (332)
नाशवान धन-संपत्ति एवं पुत्र आदि के लिए ही संसार में लोग मरे जा रहे हैं, जबकि वे वास्तव में स्थायी नहीं हैं। किन्तु जो लोग समस्त आपदा-विपत्ति सहकर भी वृन्दावन का ही सेवन करते हैं, उन बड़भागी जनों के हृदय में ही इस रज का वास्तविक भाव समाता है।
श्रीवृन्दावन सेये रहैं, सो रज माहिं समाइ ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (332)
नाशवान धन-संपत्ति एवं पुत्र आदि के लिए ही संसार में लोग मरे जा रहे हैं, जबकि वे वास्तव में स्थायी नहीं हैं। किन्तु जो लोग समस्त आपदा-विपत्ति सहकर भी वृन्दावन का ही सेवन करते हैं, उन बड़भागी जनों के हृदय में ही इस रज का वास्तविक भाव समाता है।

