वृन्दावन अब जाय रहूँगी विपति न सपनेहुँ जहाँ लहूँगी - श्री जुगलप्रिया जी

वृन्दावन अब जाय रहूँगी विपति न सपनेहुँ जहाँ लहूँगी - श्री जुगलप्रिया जी

वृन्दावन अब जाय रहूँगी विपति न सपनेहुँ जहाँ लहूँगी।
जो भावै सो करौ सबै मिलि मैं तो दृढ़ हरि चरन गहूँगी॥ [1]
प्राननाथ प्रियतम के ढिंग रहि मनमाने बहु सुखनि पगूंगी।
भली भई बन गई बात यह अब जग दारुन दुख न सहूँगी॥ [2]
करिहैं सुरति कबहुँ तौ स्वामी विषयानल में अब न दहूँगी।
'जुगलप्रिया' सतसंग मधुकरी विमल जमुन जल सदा चहूँगी॥ [3]

- श्री जुगलप्रिया जी

अब मैं श्री वृंदावन धाम में ही जाकर रहूँगी, जहाँ उन्मत्त भाव से भजन करूँगी और दुःखमय संसार का चिंतन सपने में भी नहीं करूंगी। चाहे कोई कुछ भी कहे या करे, मैं दृढ़ निश्चय के साथ श्री हरि के चरणों का ही आश्रय लूँगी। [1]

अपने प्रियतम प्राणनाथ श्री श्यामा-श्याम के संग रहकर मैं असीम आनंद और मनचाहे सुखों का अनुभव करूँगी। अब मेरी समस्त इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी हैं, और मैं इस संसार के कठोर दुःखों को और नहीं सह सकती। [2]

हे स्वामी, अब आपको मेरी बिगड़ी बनाने का दायित्व लेना ही होगा। मैं अब संसार की विषय-ज्वाला में जलने की बजाय, सत्संग, मधुकरी और विमल यमुना जी के पवित्र जल का ही आश्रय ग्रहण करूंगी। [3]