नारायण हरिकृपाकी, तकत रहै नित बाट - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (102)

नारायण हरिकृपाकी, तकत रहै नित बाट - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (102)

नारायण हरिकृपाकी, तकत रहै नित बाट ।
जानहार जिमि पार को, निरखत नौका घाट ॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (102)

जिस प्रकार डूबता हुआ मनुष्य अंतिम क्षणों में नौका-घाट की ओर आशा भरी दृष्टि से देखता रहता है, उसी प्रकार जीव को भी श्री हरि की कृपा की प्रतीक्षा करते हुए निरंतर उनकी ओर निहारना चाहिए।